Saturday, April 22, 2017

,(मित्रता)

अतुकान्त,,,,(मित्रता)
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बदले हुए भाव,
भाषा,परिभाषा,
मूल्य,चिन्तन,चेतना,
मृतप्राय संवेदना,
संस्कृति,संस्कार,
आचार-विचार,
आहार,व्यवहार,
उपदेश,परिवेश,
हाय रे मेरे देश,,,,
दुनिया को मित्रता की,
परिभाषा सिखलाने वाला,
खगोल की खोल दिखलानें वाला,
विद्याओं,कलाओं में निपुण,
कहां गए तेरे सारे गुण,
कुण्ठा,घृणा,निन्दा,
लोभ,स्वार्थ,हिंसा के
खूँ-रेज़ जबड़े,
नित प्रति मानव की सोच को,
दबोच रहे हैं
आदर्शों और मर्यादाओं को नोंच रहे है
लज्जा का चीरहरण करते
सीमित कपड़े,
गिरता हुआ
मानवता का ग्राफ
दिखाई दे रहा है साफ साफ,
इसके बावजूद,,
कायम है
अब तक मित्रता,
बदले हुए स्वरूप में,
विकास की धूप में,
देखा है मैनें,,,,
कई बार सुदामा से
आँखें चुराकर भागते हुए
कृष्ण को,
कुण्ठित कौरवों को,
देते हुए अर्जुन के सारे भेद,
है इसी बात का खेद,
कलयुग का भरत
अब नहीं लौटाना चाहता राम को
अवधपुर का सिंहासन,
सुग्रीव नें भी ठुकरा दिया है
राम से मित्रता का प्रस्ताव,
क्योंकि,,,,
रावण दे रहा है दोस्ती का दोगुना भाव,
कलयुग में
मित्र-प्रेम हो चुका है
एकदम,,,,चाइना-मेड
आज,,मित्रता का स्वरूप तो
चाय के डिस्पोजेबल गिलास के
अलावा कुछ नहीं,
रिश्तों के अर्थ बदलकर
सिर्फ 'अर्थ' के व्यूह में सिमटे हुए हैं,
नाग चन्दन के वृक्षों को छोड़कर
बबूलों से लिपटे हुए हैं,
काश !
फिर से कोई डाकू, त्यागकर हथियार,
बन जाए वाल्मीक,उठा ले हाँथों में कलम,
सृजित करे शब्दों की हुंकार,
लिखे वर्तमान की नीति का निर्धारण,
काल के बदलते चरित्र का चित्रण,
आदर्शों की परिभाषा,मानवता का मूल्य,
मर्यादा का मंथन,सत्य का स्वरूप,
सीता की गुहार,न्याय का अधिकार,
अग्नि परीक्षा का पर्याय,
अर्थात,,,,सत्य का नया अध्याय,
ताकि,,
फिर से,,कोई जटायू
असहाय अबला को बचानें हेतु
लगा दे प्राणों की बाजी,
फिर अवतरित हो महाबली हनुमान,
जो जला दे,
द्वेष,कुण्ठा,ईर्ष्या,लोभ,स्वार्थ की समूची लंका,
घर से न निकाली जाए कोई सीता,
अदालत की दहलीज़ को लाँघकर
बाहर निकल सके पवित्र गीता,
अब तो,खत्म हो प्रभु श्रीराम का वनवास,
उनके लिए हरेक दिल में बन सके आवास,
केवट का कठौता प्रेम रस की दुहाई दे ।।
कविता में कहीं तुलसीदास भी दिखाई दे ।।
कवि : डॉ."राज बुन्देली"
(मुम्बई)
09321010105 / 08080556555

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