Monday, August 6, 2012

फ़्रॆंडशिप सॆ,,,,रक्षा-बंधन,,,,तक,

फ़्रॆंडशिप सॆ,,,,रक्षा-बंधन,,,,तक,
======================
मुर्गॆ नॆं, मुर्गी कॊ, दॆखा,
मुर्गी नॆं, मुर्गॆ कॊ, दॆखा,

मुर्गॆ नॆं दांई,आंख दबाई,
मुर्गी भी बॆ-हद शरमाई,

दॊनॊं नॆं किया,कुकडूं कूं,
फ़िर हॊ गया प्यार शुरू,

फ़्रॆंडसिप बॆल्ट भी बांधा,
दॊनॊं नॆ यॆ रिश्ता साधा,

वॆलॆंटाइन मॆं, नाचॆ-झूमॆ,
कई जगह साथ मॆं घूमॆं,

हुई सगाई,विवाह बन्धन,
दॊ सॆ एक हुयॆ तन मन,

यॆ दॊनॊ प्यार कॆ दीवानॆ,
अपनी मर्जी कॆ मस्तानॆ,

इस दुनियां सॆ अनजानॆ,
गातॆ फ़िरतॆ प्रॆम- तरानॆ,

चार बरस खुशी मॆं बीतॆ,
प्रॆम-सुधा नित वह पीतॆ,

फ़िर एक कसाई आया,
मुर्गॆ का जॊ दाम लगाया,

मुर्गी अनहॊनी भांप गई,
रॊम-रॊम वह कांप गई,

अंदर सॆ वह बाहर आई,
चॊंच दबाकर राखी लाई,

रॊतॆ-रॊतॆ वॊ मुर्गी बॊली,
फ़ैलाती हूं अपनी झॊली,

त्यॊहार राखी का प्यारा,
दुनिया मॆं, सबसॆ न्यारा,

तुम कॊ राखी बांध रही,
सुहाग अपना मांग रही,

बात समझ मॆं जब आई,
कसाई, बन गया है भाई,

एक मुर्गी नॆ भाई माना,
मॆरा-धर्म है,लाज बचाना,

प्राणी रिश्तॆ, जॊड़ रहॆ है,
मानव रिश्तॆ, तॊड़ रहॆ है,

भावॊं कॊ उल्टा मॊड़ रहॆ,
आपस मॆं सिर फ़ॊड़ रहॆ,

खॆल रहॆ खून, की हॊली,
मुंह दॆखी वॊ बॊलॆं बॊली,

मुझकॊ राखी नॆ राह दिखाई है,
मैनॆ आज नई ज़िन्दगी पाई है,

मॆरॆ मन की आंखॆं खॊल गई है,
वॊ मुर्गी मुझसॆ,यह बॊल गई है,

मैं मॆहनत मज़दूरी कर-कर कॆ,
खॆतॊं मॆं रात-दिन, मर मर कॆ,

अपनॆ बीबी बच्चॊं का,मैं पॆट कैसॆ भी भरूंगा ॥
मुझॆ कसम राखी की,जीव-हत्या नहीं करूंगा ॥

कवि-राज बुन्दॆली,,,,,,,
५/८/२०१२

Friday, July 27, 2012


==============================
जी हुज़ूर क्या करना,,,
==============================
दिल कॊ इतना भी,मग़रूर क्या करना ॥
ख्वाब किसी कॆ हॊं,चूर-चूर क्या करना ॥१॥

दिल कॆ कॊनॆ मॆं, जगह दॆ दी जिसकॊ,
फ़िर उस कॊ दिल सॆ, दूर क्या करना ॥२॥

दिल का रिश्ता दिल सॆ,निभायॆं साहब,
फ़क़्त दिखावॆ का,यॆ दस्तूर क्या करना ॥३॥

मालूम है वह चाहत, है किसी और की,
दीदार खिड़की सॆ यूं,घूर-घूर क्या करना ॥४॥

पीनॆ की मनाही नहीं, निगाहॊं का ज़ाम,
पी कॆ दिल कॊ यूं, मख़मूर क्या करना ॥५॥

जिसकॆ मुकद्दर मॆं हैं,यॆ मिलॆंगॆ उसीकॊ,
हमॆं तुम्हारॆ यॆ मीठॆ, अंगूर क्या करना ॥६॥

हर कॊई करता है, जिस का तज़किरा,
उसका क़लाम मॆं, मज़कूर क्या करना ॥७॥

कामयाबी मॆहनत कॆ,बल पॆ मिलती है,
इसकॆ वास्तॆ नाहक, फ़तूर क्या करना ॥८॥

हीरॆ की शिफ़त है तॊ,छिप नहीं सकती,
कांच का टुकड़ा है ग़र, नूर क्या करना ॥९॥

आम बात हॊ या, फ़रमान शहंशाह का,
बात वाज़िब नहीं तॊ,मंज़ूर क्या करना ॥१०॥

सरकारी मुलाज़िम है, वॊ खुदा तॊ नहीं,
हर बात पॆ उसकी,जी हुज़ूर क्या करना ॥११॥

फ़क्त तॆरॆ नाम सॆ यॆ, मुकम्मल हॊ गई,
इस गज़ल कॊ अब,मामूर क्या करना ॥१२॥

नॆक-नामॊं मॆं शरीक़,हॊ गया नाम जब,
इससॆ ज्यादा इसकॊ,मशहूर क्या करना ॥।१३॥

गज़ल उम्दा हॊगी तॊ,दाद मिलॆगी"राज"
टैंग करकॆ लॊगॊं कॊ,मज़बूर क्या करना ॥१४॥

कवि-राज बुन्दॆली
२४/०७/२०१२

कुछ शब्दार्थ,,,,,,,,,
मग़रूर=घमंड,
मख़मूर=नशे में चूर,
तज़किरा=चर्चा,जिक्र,
मज़कूर=विवरण,
फ़तूर=खुराफ़ात,
मामूर=पूर्ण,

Thursday, June 7, 2012

हल्दीघाटी..........

हल्दीघाटी..........
----------------------------
वही मिला है जग मॆं सब कॊ, जिसनॆं जॊ कुछ बॊया,
मिला ललाट कलंक किसी कॊ,कॊई सम्मान संजॊया,
मात-पिता की सॆवा सॆ बढ़कर, और ना कॊई पूजा है,
निज राष्ट्र-धर्म सॆ ऊँचा जग मॆं, धर्म ना कोई दूजा है,

प्राणॊं की बलि चढ़ जायॆ, मान झुकॆ ना माटी का !!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है, तुमसॆ हल्दीघाटी का !!१!!

राँणा प्रताप कॆ भालॆ नॆं,लिख दी दॆखॊ अमर कहानी,
स्वाभिमान मॆं मिट ना जायॆ,है उसकी ब्यर्थ जवानी,
पद्मिनियॊं नॆं जौहर करकॆ,अपनी आन नहीं जानॆं दी,
स्वाभिमान कॆ सूरज की, कदापि शान नहीं जानॆं दी,

खौफ़ ना खाया चॆतक नॆं, गजराजॊं की कद काठी का !!२!!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है,तुमसॆ.............................

राजस्थान की धरती नॆं,रणवीरॊं की फ़सल उगाई है,
लाखॊं बॆटॆ बलिदान हुयॆ, तब जाकर आज़ादी पाई है,
इतिहास कॆ पन्नॊं पर, तब यह उन्नत  भाल  हुई है,
वीरॊं कॆ शॊणित सॆ जब, पूरी हल्दीघाटी  लाल हुई है,

नाम अमर हॊ जाता जग मॆं, वीरॊं की परिपाटी का !!३!!
कंकड- कंकड बॊल रहा है,तुमसॆ.....................

वंदन है युवा शक्ति, आगॆ आऒ, अब आगॆ आऒ,
राष्ट्र-धर्म की रक्षा मॆं, तलवार उठाऒ ढ़ाल उठाऒ,
जन-जन मॆं दॆश-भक्ति का,तुम अद्भुत संचार भरॊ,
मुक्त हृदय सॆ इस भारत,मां की जय-जयकार करॊ,

कर्ज़ चुकाना हॊगा हमकॊ, उस दाल और बाटी का !!४!!
कंकड़- कंकड़ यह बॊल रहा है,तुमसॆ......................

कवि-राज बुन्दॆली
०८/०६/२००८

Wednesday, May 30, 2012

चंद्रशॆखर "आज़ाद"
-----------------
सूरज कॆ वंदन सॆ पहलॆ, भारत का वंदन करता था,
इसकी पावन मिट्टी सॆ,माथॆ पर चन्दन करता था,
इसकी गौरव गाथाऒ का,हर क्षण-गायन करता था,
आज़ादी की रामायण का,नित्य पारायण करता था,

संपूर्ण क्रांन्ति का भारत मॆं, शायद जन-नाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥१॥

भारत माँ का सच्चा बॆटा, आज़ादी का पूत वही था,
उग्र-क्रान्ति की सॆना का,संकट-मॊचन दूत वही था,
आज़ादी की खातिर जन्मा, आज़ादी मॆं जिया मरा,
अंग्रॆजी तॊपॊं की बौछारॊं सॆ,शॆर-बब्बर ना कभी डरा,

अब कपटी कालॆ अंग्रॆजॊं का, खंडित उन्माद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥२॥

इस सॊनॆ की चिड़िया कॊ,खुलॆ-आम जॊ लूट रहॆ थॆ,
उसकॆ कॆहरि-गर्जन सॆ बस,सबकॆ छक्कॆ छूट रहॆ थॆ,
उस मतवालॆ की सांसॊं मॆं, आज़ादी थी,आज़ादी थी,
हर बूँद रुधिर की उस की, आज़ादी की, उन्मादी थी,

भारत की सीमाऒं पर कॊई,निर्णायक संवाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥३॥

अधिकारॊं की खातिर मरना,सिखा गया वह बलिदानी,
स्वाभिमान की रक्षा मॆं, सबकॊ दॆनी पड़ती है कुर्वानी,
मुक्त-हृदय सॆ उसकी गौरव,गाथा का अभिनंदन करलॆं,
भारत माँ कॆ उस बॆटॆ कॊ,आऒ सत-सत वंदन करलॆं,

यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥४॥

कवि-राज बुन्दॆली
२९/०५/२०१२

Thursday, April 12, 2012

शीर्षक--भीड़ू कब सॆ,,,,,,,,

शीर्षक--भीड़ू कब सॆ,,,,,,,,
--------------------------

इन्तज़ार मॆं उसकॆ खड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥
बता तॆरा यॆ टांका भिड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥१॥

वॊ घास भी तॊ नहीं डालती है तुझकॊ,

तू नहा धॊ कॆ पीछॆ पड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥२॥

पढ़ाई लिखाई की वाट लगा डाली तूनॆ,

सर पर तॆरॆ बुखार चढ़ा है भीड़ू कब सॆ ॥३॥

समझदारी की बात कॊ समझता नहीं,

बतादॆ तॆरा दिमाग सड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥४॥

तॆरॆ मुकद्दर मॆं हॊयॆगी जॊ मिलॆगी वही,

क्यूं ज़िद मॆं उसकी अड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥५॥

मैं तॊ कहता हूं सारॆ लफ़ड़ॆ अब छॊड़ दॆ,

इश्क कॆ दलदल मॆं गड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥६॥

अपनॆ हांथॊं कैरेक्टर गिरा रहा क्यॊं बॆ,

यह कैरॆक्टर बहुत बड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥७॥

चल यार अपुन दॊनॊ मुशायरा सुनॆंगॆ,

आज"राज"मंच पॆ खड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥८॥

कवि-राज बुन्दॆली

१२/०४/२०१२

Monday, March 26, 2012

बबाल किसी और का,,,,

बबाल किसी और का,,,,
----------------------------------

यूं भी आता है सर पॆ बबाल किसी और का ॥
दिल अपना हॊता है ख्याल किसी और का ॥

अचानक पर्स उनका खॊला, तॊ पाया हमनॆ,

है ख़त किसी और का,रुमाल किसी और का ॥

एक कंजूस नॆ हॊली, मनाई कुछ इस तरह,

मासूका थी और की, गुलाल किसी और का ॥

खुद कॊ कुबॆर समझता है न जानॆ क्यूं कर,

खज़ाना है और का,टकसाल किसी और का ॥

मंचॊ पॆ मिलता है दॆखनॆ कॊ "राज"अक्सर,

गज़ल किसी और का,कमाल किसी और का ॥

कवि-राज बुन्देली

२६/०३/२०१२

Tuesday, March 13, 2012

दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,


  दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,

----------------------------------------------------------
मॆरी तस्वीर लगाकॆ जॊ सीनॆ सॆ रखतॆ हैं

दॆखना है दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥१॥


मॊहब्बत मॆं जां लुटानॆ की बात करतॆ हैं,

मॆरॆ लहू का माप, जॊ पसीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥२॥


 यॆ और बात है, मैं ज़िंदा हूं, अब तलक,

 नज़र वॊ मुझ पॆ कई महीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥३॥


आज कल फ़रिश्तॆ कहॆ जातॆ हैं वॊ लॊग

खुद कॊ दूर जॊ डूबतॆ सफ़ीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥४॥


ज़िंदा-दिली उनकॊ , रास आयॆगी कभी,
कम-ज़र्फ़ तॊ रिश्तॆ कमीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥५॥


आतॆ हैं खातॆ-पीतॆ हैं चलॆ जातॆ हैं लॊग,
ज़मानॆ सॆ नहीं मतलब जीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥६॥


मंदिर मॆं पियॆं या फ़िर मस्ज़िद मॆं पियॆं,
उसकॆ आशिक़ मतलब पीनॆं सॆ रखतॆ हैं ॥७॥


उनकी हिफ़ाज़त ख़ुदा करता है "राज",
ख्यालॊ-किरदार जॊ नगीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥८॥

 

कवि-राज बुन्दॆली
  १३/०३/२०१२