Thursday, January 19, 2012

अधूरॆ हैं हम,,,,,,

अधूरॆ हैं हम,,,,,,
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कहनॆ कॊ यूं तॊ, भरॆ पूरॆ हैं हम
मगर हकीकत मॆं, अधूरॆ हैं हम
...
जब जैसा चाहॆ नचाता है हमकॊ,
वक्त की डुगडुगी कॆ ज़मूरॆ हैं हम

सिर्फ़ कॊई छॆड़ दॆ, भला, या बुरा,
झनझना उठतॆ ऎसॆ तमूरॆ हैं हम

बांटतॆ फ़िर रहॆ,नफ़रत का ज़हर,
इंसान कॆ रूप मॆं भी धतूरॆ हैं हम

किस मुंह सॆ कब, किसॆ काट लॆं,
दॊ मुंह वालॆ वॊ कनखजूरॆ हैं हम

गांधी कॆ बंदरॊं सॆ सीखा है "राज",
गूंगॆ हैं, बहरॆ हैं, और सूरॆ हैं हम

कवि-राज बुन्दॆली
१९/०१/२०१२

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

बहुत सुंदर, वाह !!!

Rajeev Upadhyay said...

Wah wah kya kahana is ghazal ka. Bahut khoob

इमरान अंसारी (عمران انصاری) said...

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