Friday, July 27, 2012
Thursday, June 7, 2012
हल्दीघाटी..........
हल्दीघाटी..........
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वही मिला है जग मॆं सब कॊ, जिसनॆं जॊ कुछ बॊया,
मिला ललाट कलंक किसी कॊ,कॊई सम्मान संजॊया,
मात-पिता की सॆवा सॆ बढ़कर, और ना कॊई पूजा है,
निज राष्ट्र-धर्म सॆ ऊँचा जग मॆं, धर्म ना कोई दूजा है,
प्राणॊं की बलि चढ़ जायॆ, मान झुकॆ ना माटी का !!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है, तुमसॆ हल्दीघाटी का !!१!!
राँणा प्रताप कॆ भालॆ नॆं,लिख दी दॆखॊ अमर कहानी,
स्वाभिमान मॆं मिट ना जायॆ,है उसकी ब्यर्थ जवानी,
पद्मिनियॊं नॆं जौहर करकॆ,अपनी आन नहीं जानॆं दी,
स्वाभिमान कॆ सूरज की, कदापि शान नहीं जानॆं दी,
खौफ़ ना खाया चॆतक नॆं, गजराजॊं की कद काठी का !!२!!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है,तुमसॆ...................... .......
राजस्थान की धरती नॆं,रणवीरॊं की फ़सल उगाई है,
लाखॊं बॆटॆ बलिदान हुयॆ, तब जाकर आज़ादी पाई है,
इतिहास कॆ पन्नॊं पर, तब यह उन्नत भाल हुई है,
वीरॊं कॆ शॊणित सॆ जब, पूरी हल्दीघाटी लाल हुई है,
नाम अमर हॊ जाता जग मॆं, वीरॊं की परिपाटी का !!३!!
कंकड- कंकड बॊल रहा है,तुमसॆ.....................
वंदन है युवा शक्ति, आगॆ आऒ, अब आगॆ आऒ,
राष्ट्र-धर्म की रक्षा मॆं, तलवार उठाऒ ढ़ाल उठाऒ,
जन-जन मॆं दॆश-भक्ति का,तुम अद्भुत संचार भरॊ,
मुक्त हृदय सॆ इस भारत,मां की जय-जयकार करॊ,
कर्ज़ चुकाना हॊगा हमकॊ, उस दाल और बाटी का !!४!!
कंकड़- कंकड़ यह बॊल रहा है,तुमसॆ......................
कवि-राज बुन्दॆली
०८/०६/२००८
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वही मिला है जग मॆं सब कॊ, जिसनॆं जॊ कुछ बॊया,
मिला ललाट कलंक किसी कॊ,कॊई सम्मान संजॊया,
मात-पिता की सॆवा सॆ बढ़कर, और ना कॊई पूजा है,
निज राष्ट्र-धर्म सॆ ऊँचा जग मॆं, धर्म ना कोई दूजा है,
प्राणॊं की बलि चढ़ जायॆ, मान झुकॆ ना माटी का !!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है, तुमसॆ हल्दीघाटी का !!१!!
राँणा प्रताप कॆ भालॆ नॆं,लिख दी दॆखॊ अमर कहानी,
स्वाभिमान मॆं मिट ना जायॆ,है उसकी ब्यर्थ जवानी,
पद्मिनियॊं नॆं जौहर करकॆ,अपनी आन नहीं जानॆं दी,
स्वाभिमान कॆ सूरज की, कदापि शान नहीं जानॆं दी,
खौफ़ ना खाया चॆतक नॆं, गजराजॊं की कद काठी का !!२!!
कंकड़- कंकड़ बॊल रहा है,तुमसॆ......................
राजस्थान की धरती नॆं,रणवीरॊं की फ़सल उगाई है,
लाखॊं बॆटॆ बलिदान हुयॆ, तब जाकर आज़ादी पाई है,
इतिहास कॆ पन्नॊं पर, तब यह उन्नत भाल हुई है,
वीरॊं कॆ शॊणित सॆ जब, पूरी हल्दीघाटी लाल हुई है,
नाम अमर हॊ जाता जग मॆं, वीरॊं की परिपाटी का !!३!!
कंकड- कंकड बॊल रहा है,तुमसॆ.....................
वंदन है युवा शक्ति, आगॆ आऒ, अब आगॆ आऒ,
राष्ट्र-धर्म की रक्षा मॆं, तलवार उठाऒ ढ़ाल उठाऒ,
जन-जन मॆं दॆश-भक्ति का,तुम अद्भुत संचार भरॊ,
मुक्त हृदय सॆ इस भारत,मां की जय-जयकार करॊ,
कर्ज़ चुकाना हॊगा हमकॊ, उस दाल और बाटी का !!४!!
कंकड़- कंकड़ यह बॊल रहा है,तुमसॆ......................
कवि-राज बुन्दॆली
०८/०६/२००८
Wednesday, May 30, 2012
चंद्रशॆखर "आज़ाद"
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सूरज कॆ वंदन सॆ पहलॆ, भारत का वंदन करता था,
इसकी पावन मिट्टी सॆ,माथॆ पर चन्दन करता था,
इसकी गौरव गाथाऒ का,हर क्षण-गायन करता था,
आज़ादी की रामायण का,नित्य पारायण करता था,
संपूर्ण क्रांन्ति का भारत मॆं, शायद जन-नाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥१॥
भारत माँ का सच्चा बॆटा, आज़ादी का पूत वही था,
उग्र-क्रान्ति की सॆना का,संकट-मॊचन दूत वही था,
आज़ादी की खातिर जन्मा, आज़ादी मॆं जिया मरा,
अंग्रॆजी तॊपॊं की बौछारॊं सॆ,शॆर-बब्बर ना कभी डरा,
अब कपटी कालॆ अंग्रॆजॊं का, खंडित उन्माद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥२॥
इस सॊनॆ की चिड़िया कॊ,खुलॆ-आम जॊ लूट रहॆ थॆ,
उसकॆ कॆहरि-गर्जन सॆ बस,सबकॆ छक्कॆ छूट रहॆ थॆ,
उस मतवालॆ की सांसॊं मॆं, आज़ादी थी,आज़ादी थी,
हर बूँद रुधिर की उस की, आज़ादी की, उन्मादी थी,
भारत की सीमाऒं पर कॊई,निर्णायक संवाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥३॥
अधिकारॊं की खातिर मरना,सिखा गया वह बलिदानी,
स्वाभिमान की रक्षा मॆं, सबकॊ दॆनी पड़ती है कुर्वानी,
मुक्त-हृदय सॆ उसकी गौरव,गाथा का अभिनंदन करलॆं,
भारत माँ कॆ उस बॆटॆ कॊ,आऒ सत-सत वंदन करलॆं,
यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं हॊगा ॥
जब तक इस भूमि पर पैदा, फिर सॆ आज़ाद नहीं हॊगा ॥४॥
कवि-राज बुन्दॆली
२९/०५/२०१२
Thursday, April 12, 2012
शीर्षक--भीड़ू कब सॆ,,,,,,,,
शीर्षक--भीड़ू कब सॆ,,,,,,,,
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इन्तज़ार मॆं उसकॆ खड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥
बता तॆरा यॆ टांका भिड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥१॥
वॊ घास भी तॊ नहीं डालती है तुझकॊ,
तू नहा धॊ कॆ पीछॆ पड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥२॥
पढ़ाई लिखाई की वाट लगा डाली तूनॆ,
सर पर तॆरॆ बुखार चढ़ा है भीड़ू कब सॆ ॥३॥
समझदारी की बात कॊ समझता नहीं,
बतादॆ तॆरा दिमाग सड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥४॥
तॆरॆ मुकद्दर मॆं हॊयॆगी जॊ मिलॆगी वही,
क्यूं ज़िद मॆं उसकी अड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥५॥
मैं तॊ कहता हूं सारॆ लफ़ड़ॆ अब छॊड़ दॆ,
इश्क कॆ दलदल मॆं गड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥६॥
अपनॆ हांथॊं कैरेक्टर गिरा रहा क्यॊं बॆ,
यह कैरॆक्टर बहुत बड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥७॥
चल यार अपुन दॊनॊ मुशायरा सुनॆंगॆ,
आज"राज"मंच पॆ खड़ा है भीड़ू कब सॆ ॥८॥
कवि-राज बुन्दॆली
१२/०४/२०१२
Monday, March 26, 2012
बबाल किसी और का,,,,
बबाल किसी और का,,,,
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यूं भी आता है सर पॆ बबाल किसी और का ॥
दिल अपना हॊता है ख्याल किसी और का ॥
अचानक पर्स उनका खॊला, तॊ पाया हमनॆ,
है ख़त किसी और का,रुमाल किसी और का ॥
एक कंजूस नॆ हॊली, मनाई कुछ इस तरह,
मासूका थी और की, गुलाल किसी और का ॥
खुद कॊ कुबॆर समझता है न जानॆ क्यूं कर,
खज़ाना है और का,टकसाल किसी और का ॥
मंचॊ पॆ मिलता है दॆखनॆ कॊ "राज"अक्सर,
गज़ल किसी और का,कमाल किसी और का ॥
कवि-राज बुन्देली
२६/०३/२०१२
Tuesday, March 13, 2012
दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,
दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,
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मॆरी तस्वीर लगाकॆ जॊ सीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥
दॆखना है दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥१॥
मॊहब्बत मॆं जां लुटानॆ की बात करतॆ हैं,
मॆरॆ लहू का माप, जॊ पसीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥२॥
यॆ और बात है, मैं ज़िंदा हूं, अब तलक,
नज़र वॊ मुझ पॆ कई महीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥३॥
आज कल फ़रिश्तॆ कहॆ जातॆ हैं वॊ लॊग
खुद कॊ दूर जॊ डूबतॆ सफ़ीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥४॥
ज़िंदा-दिली उनकॊ न, रास आयॆगी कभी,
कम-ज़र्फ़ तॊ रिश्तॆ कमीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥५॥
आतॆ हैं खातॆ-पीतॆ हैं चलॆ जातॆ हैं लॊग,
ज़मानॆ सॆ नहीं मतलब जीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥६॥
मंदिर मॆं पियॆं या फ़िर मस्ज़िद मॆं पियॆं,
उसकॆ आशिक़ मतलब पीनॆं सॆ रखतॆ हैं ॥७॥
उनकी हिफ़ाज़त ख़ुदा करता है "राज",
ख्यालॊ-किरदार जॊ नगीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥८॥
कवि-राज बुन्दॆली
१३/०३/२०१२
Saturday, March 10, 2012
साहिल पॆ जिसनॆ मुझकॊ,,,,,,,
साहिल पॆ जिसनॆ मुझकॊ,,,,,,,
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आँचल हया का सर सॆ सरकनॆ नहीं दिया ॥
चॆहरॆ पॆ दिल का ग़म भी झलकनॆ नहीं दिया ॥
तॆबर अना कॆ, उनकॆ, कभी ख़म नहीं हुयॆ,
मिरॆ मिज़ाज़ नॆ मुझकॊ भी झुकनॆ नहीं दिया ॥
कुछ तर्कॆ-तआल्लुकात की दुश्वारियां तॊ थीं,
कुछ गर्दिशॊं नॆं भी मुझकॊ सम्हलनॆ नहीं दिया ॥
आज समंदर सा हॊता यकीनन रुतबा मॆरा,
दायरॊं नॆ कभी भी मुझकॊ पसरनॆ नहीं दिया ॥
मॆरॆ सफ़ीनॆ का मॆरा अपना नाखुदा था वॊ,
साहिल पॆ जिसनॆ मुझकॊ उतरनॆ नहीं दिया ॥
कॊशिशॆं तॊ बॆहिसाब की अपनॊं नॆ मगर,
गैरॊं की दुआवॊं नॆं मुझकॊ मरनॆ नहीं दिया ॥
बॆखबर है वॊ ज़िन्दा हूं मैं जिसकॆ वास्तॆ,
उसकी खामॊशी नॆ इज़हार करनॆ नहीं दिया ॥
उसकॆ दामन पॆ तहरीर लिखता तॊ कैसॆ,
अश्कॊं की मानिंद मुझकॊ गिरनॆ नहीं दिया ॥
छॊड़ दॆता दर,गली,शहर,महफ़िल मगर,
उसकॆ एक वादॆ नॆ मुझकॊ मुकरनॆ नहीं दिया ॥
रॆत पर खड़ा था मॆरी मॊहब्बत का मकां,
बुनियाद पॆ पत्थर तॊ उसनॆ धरनॆ नहीं दिया ॥
बड़ा कठिन है ज़मानॆ सॆ लड़ना "राज",
बुलंद हौसलॊं नॆ मुझकॊ बिखरनॆ नहीं दिया ॥
कवि-राज बुन्दॆली
११/०३/२०१२
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आँचल हया का सर सॆ सरकनॆ नहीं दिया ॥
चॆहरॆ पॆ दिल का ग़म भी झलकनॆ नहीं दिया ॥
तॆबर अना कॆ, उनकॆ, कभी ख़म नहीं हुयॆ,
मिरॆ मिज़ाज़ नॆ मुझकॊ भी झुकनॆ नहीं दिया ॥
कुछ तर्कॆ-तआल्लुकात की दुश्वारियां तॊ थीं,
कुछ गर्दिशॊं नॆं भी मुझकॊ सम्हलनॆ नहीं दिया ॥
आज समंदर सा हॊता यकीनन रुतबा मॆरा,
दायरॊं नॆ कभी भी मुझकॊ पसरनॆ नहीं दिया ॥
मॆरॆ सफ़ीनॆ का मॆरा अपना नाखुदा था वॊ,
साहिल पॆ जिसनॆ मुझकॊ उतरनॆ नहीं दिया ॥
कॊशिशॆं तॊ बॆहिसाब की अपनॊं नॆ मगर,
गैरॊं की दुआवॊं नॆं मुझकॊ मरनॆ नहीं दिया ॥
बॆखबर है वॊ ज़िन्दा हूं मैं जिसकॆ वास्तॆ,
उसकी खामॊशी नॆ इज़हार करनॆ नहीं दिया ॥
उसकॆ दामन पॆ तहरीर लिखता तॊ कैसॆ,
अश्कॊं की मानिंद मुझकॊ गिरनॆ नहीं दिया ॥
छॊड़ दॆता दर,गली,शहर,महफ़िल मगर,
उसकॆ एक वादॆ नॆ मुझकॊ मुकरनॆ नहीं दिया ॥
रॆत पर खड़ा था मॆरी मॊहब्बत का मकां,
बुनियाद पॆ पत्थर तॊ उसनॆ धरनॆ नहीं दिया ॥
बड़ा कठिन है ज़मानॆ सॆ लड़ना "राज",
बुलंद हौसलॊं नॆ मुझकॊ बिखरनॆ नहीं दिया ॥
कवि-राज बुन्दॆली
११/०३/२०१२
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